नई दिल्ली। प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान की सरकार ने भारत को नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी पहली विदेश यात्राओं में चीन और मलेशिया को चुना है, तथा बीजिंग के साथ मोंगला पोर्ट और तीस्ता नदी के विकास से जुड़े अरबों डॉलर के रणनीतिक समझौते किए हैं। भारत का अंग माने जाने वाला बंगला देश जिसके उदय में भारत की ही एक मात्र भूमिका है वो बंगलादेश किन्हीं कारणों के चलते अब भारत से दूर और चीन के बेहद करीब हो चला है। चीन और भारत की अदावत किसी से छिपी नहीं है। बंगालदेश की पीएम तारिक रहमान चीन के दौरे पर हैं। उन्होंने चीन के साथ कई ऐसे समझौते किए हैं जिन्हें भारतीया हितों के लिहाज से उचित नहीं माना जा सकता है। वहीं दूसरी ओर चीन के नजदीक और भारत से दूर बंगलादेश के रवैये के बाद अब भारतीय विदेश नीति को लेकर सवाल पूछे जाने लगे हैं। ऐसी क्या वजह हुई जो भारतीय विदेश मंत्रालय अपने पड़ौसियों को नहीं साध पा रहा है।किसी भी देश के प्रधानमंत्री का पहला विदेश दौरा शायद ही कभी संयोगवश होता होगा और बंगलादेश की पीएम का पहला दौरा बजाए भारत के चीन का हुआ है।
पीएम मोदी ने बंगलादेश के पीएम तारिक रहमान को भारत आने का न्यौता दिया था, लेकिन बंगलादेशी पीएम ने बजाए भारत आने के पहले मलेशिया और फिर चीन जाने को तरजीह दी। बीते 22 व 23 जून को मलेशिया और फिर वहां से चीन पहुंचे। जानकारों का कहना है कि भारत को फ़िलहाल यात्रा कार्यक्रम में शामिल न करना सीधे तौर पर किसी संदेश के रूप में देखना भले जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इसे कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यह भारतीय हित नहीं माना जा सकता। कुछ का कहना है कि पिछले दिनों बंगलादेशियों के साथ भारत सरकार के रवैये खासतौर से असम और बंगाल राज्यों की घटना को संभवत बंगलादेश की नाराज हो। हालांकि इसका इजहार खुलकर अभी तक नहीं किया गया है।
भारत कितना प्रभावित
तारीक रहमान के दौरे के दौरान बंगलादेश के चीन से कई अहम समझौते हुए हैं। इनसे भारत कितना प्रभावित है यह देखना हाेगा। यदि समझौतों की बात की जाए तो बंगलादेश ने कहा है कि चीन इन्फ़्रास्ट्रक्चर में निवेश और बढ़ाए। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पर भारत की आपत्ति रही है क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुज़रती है। इसके अलावा बंगलादेश ने एक चीनी सरकारी कंपनी के साथ मोंगला में एक इकानॉमिक जोन विकसित करने के लिए समझौता किया है। यह वही भूमि है जिसे पहले एक भारतीय इकनॉमिक ज़ोन के लिए निर्धारित किया गया था।
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