नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म होने का इंतजार कर रहे दुनिया के देशों के लिए यह खबर बेहद बुरी हो सकती है। हालात की यदि बात करें तो पलड़ा फिलहाल जंग के और ज्यादा बढ़ने (Escalation) की तरफ झुका हुआ है। नवंबर 2026 में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव इस पूरे संकट का टर्निंग पॉइंट साबित होंगे। नवंबर के बाद जंग बेहद बुरे दौर में पहुंच सकती है। हालांकि ईरान ने पहले से खुद को ना केवल संभाला है बल्कि जंग को लेकर युद्ध स्तर पर तैयारियां भी की हैं। यदि जंग तेज होती है तो यह अमेरिका को भी कम नुकसान नहीं पहुंचाएगी। चुनावों से पहले कतरी मध्यस्थ कोई बीच का रास्ता निकालने में कामयाब नहीं होते, तो आने वाले महीनों में एक बहुत बड़ा और विनाशकारी सैन्य टकराव देखने को मिल सकता है।
फौजी तैनाती बढ़ा रहे ट्रंप
जुलाई 2026 में संघर्ष विराम समझौता टूटने के बाद, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और मिडिल ईस्ट में तीसरा विमानवाहक पोत (aircraft carrier) व 10,000 अतिरिक्त अमेरिकी सैनिक तैनात करने के आदेश दिए हैं। दूसरी ओर, ईरान ने भी चेतावनी दी है कि यदि नया हमला हुआ, तो वह इस जंग को हिंद महासागर तक फैला देगा और अमेरिकी ठिकानों पर विनाशकारी पलटवार करेगा।
एक लाख करोड़ डालर
हार्वड केनडी स्कूल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस जंग का तात्कालिक सैन्य खर्च करीब $2 बिलियन (लगभग ₹16,000 करोड़) प्रतिदिन तक आंका गया है। अनुमान है कि यदि यह लंबा चला, तो कुल युद्ध लागत $1 ट्रिलियन (1 लाख करोड़ डॉलर) को पार कर सकती है। के अनुसार, सितंबर 2026 तक अमेरिका इस जंग में $38 बिलियन से अधिक खर्च कर चुका है, जिसमें आधे से ज्यादा हिस्सा मिसाइल और गोला-बारूद (munitions) को बदलने में गया है। ईरान के सस्ते ड्रोनों ($50,000) को गिराने के लिए अमेरिका को अपने महंगे पैट्रियट (Patriot) और थाड (THAAD) मिसाइल इंटरसेप्टर दागने पड़ रहे हैं, जिनकी कीमत $4 मिलियन से $12 मिलियन प्रति मिसाइल है। इससे अमेरिकी रक्षा भंडारों में कमी आ रही है।
उलझ गया अमेरिका
इस जंग के कारण अमेरिका पूरी तरह मिडिल ईस्ट में उलझ गया है। इसका सीधा फायदा चीन और रूस जैसे वैश्विक प्रतिद्वंद्वी उठा रहे हैं, जो एशिया-प्रशांत और यूरोप में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं। इसके अलावा अमेरिकी नौसेना के 5वें बेड़े (5th Fleet) के बेस को भी क्षति हुई है और युद्ध के बढ़ने पर अमेरिकी सैनिकों के हताहत (casualties) होने का जोखिम बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
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