मंडलायुक्त व डीएम को ज्ञापन, मेरठ के मुसलमानों में नाराजगी, लोग बोले शांति भंग करना नहीं उचित
मेरठ।लोनी और सहारनपुर की मस्जिद जमीदोंज की जा चुकी हैं, मुरादाबाद की एक मस्जिद को नोटिस जारी किया गया है। इसी तर्ज पर मेरठ कोतवाली इलाके में मौजूद प्राचीन करीब सात सौ साल पुरानी बतायी जा रही शाही जामा मस्जिद को लेकर सवाल खड़े हिकए जा रहे हैं। अधिवक्ता राम कुमार शर्मा ने दावा किया है कि शाही जामा मस्जिद की जगह पर सम्राट अशोक के काल में बौद्ध मठ था. इसको लेकर उन्होंने डीएम और कमिश्नर से शिकायत कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सर्वे की मांग की है। दावा किया गया है कि मंडलायुक्त ने जांच के आदेश दिए हैं। वहीं दूसरी ओर फायर ब्रांड हिन्दू नेता सचिन सिरोही ने भी शाही जामा मस्जिद के नीचे मठ या मंदिर होने का की बात कहते हुए सीएम योगी से जांच की मांग की है। मेरठ की शाही जामा मस्जिद शहर के बीचों बीच घनी आबादी वाले इलाके में स्थिति है जहां दोनों ही संप्रदाय के लोग आपसी भाईचारे से रहते हैं।
11वीं शताब्दी में निर्माण
मेरठ यानी रावण की ससुराल में बनी जामा मस्जिद जो कि शहर के बीचोबीच कोतवाली के पीछे मोरीपाड़ा में स्थित है। मेरठ की जामा मस्जिद की बात करें तो विश्व में सिर्फ तीन ही ऐसी मस्जिद हैं। जिनमें दो अपने देश भारत में जबकि तीसरी श्रीलंका में है। मेरठ की शाही जामा मस्जिद सल्तनत काल की वास्तुकला का अनूठा नमूना है। इस जामा मस्जिद की दीवारें और इसके अंदर की बनावट इतनी शानदार है कि इसको देखने वाला देखता ही रह जाए। गर्मी में इसके भीतर किसी पंखे या एसी की जरूरत रही होती। जामा मस्जिद में करीब एक हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं। जानकार बताते हैं कि कोतवाली के पीछे स्थित इस मस्जिद का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने शुरू करवाया था। उसके बाद इल्तुतमिश के पौत्र नसीरूद्दीन महमूद ने इसके निर्माण को पूरा कराया। जामा मस्जिद 1239 ई.में बनकर तैयार हुई। यह सल्तनत काल की वास्तुकला का एक बेहतरीन अनूठा नमूना है। यह एक अति पवित्र धार्मिक स्थल के रूप में माना जाता है। निर्माण काल के बाद से इस मस्जिद में आज तक लगातार नमाज अदा की जा रही है।
कुरआन की आयतें
इस मस्जिद की खासियत है कि इनमें भीतर मौसम बहुत कूल रहता है। गर्मी में पंखे इत्यादी की जरूरत नहीं पड़ी। इस मस्जिद के भीतर दीवारों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं। जामा मस्जिद की दीवारें करीब 10 फीट मोटी हैं। मस्जिद के निर्माण में अधिकांश मिटटी और चूने का प्रयोग किया गया है। मिटटी और चूने से इसकी दीवारें बनाई गई है। दीवारों की चौड़ाई करीब दस फीट है। वहीं इन दीवारों की ऊचाई करीब 50 फीट है। इस मस्जिद में तीन गुंबद हैं। जबकि आमतौर पर मस्जिदों में एक ही गुंबद होती है। जामा मस्जिद के चारों तरफ दरवाजे हैं। इस दरवाजों की खासियत हैं कि यह सभी दरवाजें नुकीले हैं। बताया जाता है कि मुगल सल्तनत के दौरान हुमायूं ने सभी धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए उनके मुख्य द्वारों पर लगे दरवाजे पर लोहे के नुकीली मोटी कील लगवाई थी। यह सुरक्षा के लिए थी। उस दौरान हमले आदि होने पर दरवाजे आदि तोड़ने के लिए हाथियों का प्रयोग किया जाता था। हाथी अपने मस्तक के प्रहार से दरवाजों को तोड़ देता था। इस मस्जिद को देखने के लिए बहुत दूर-दूर से लोग आते हैं। कोतवाली क्षेत्र की जामा मस्जिद पुरानी मस्जिदों में शुमार है, जो देश-विदेश में भी प्रसिद्ध है।
ऐतिहासिक महत्व
इसके ऐतिहासिक महत्व को निहारने के लिए लोग दूर-दूर से यहां आते हैं। इतिहास की बात करें तो महमूद गजनवी ने मेरठ के इस रकबे पर जामा मस्जिद बनवाने का ऐलान किया था। यह बात सन् 1019 के आसपास की है। वहीं उलेमाओं का मानना है कि करीब 700 साल पहले सुल्तान नासिरुद्दीन ने शाही जामा मस्जिद के रूप में इसका निर्माण शुरू करवाया था। सात सौ साल पहले यहां सिर्फ पीछे का ही हिस्सा बना था। यहां की तीन गुंबदें मुगलों के समय की हैं। गुंबदों और आगे के हिस्से को छोड़कर अन्य हिस्सों का निर्माण बाद में कराया गया। लोगों की संख्या को देखते हुए ऊपर की बिल्डिंग हाल ही में बनाई गई है।
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