मुसलमानों की नाराजगी उन्हें सपा व कांग्रेस के करीब है ले आयी, भाजपा के मुस्लिम चेहरों का यूपी के मुसलमानों पर नहीं कोई असर
नई दिल्ली/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लगभग 19 से 20 प्रतिशत की आबादी के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य की 143 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करने में निर्णायक साबित होते हैं, लेकिन बदले हालात में खासतौर से साल 2017 के बाद से यूपी में मुस्लिम कम्युनिटी में यह सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या उन्हें चुनाव के दौरान निर्णायक रहने दिया जाता है। पुलिस फोर्स जब बूथ तक जाने ही नहीं देती तो फिर वो निर्णायक कैसे हो सकते हैं। यह तो बात हुई मुस्लिम कंप्यूनिटी की।
मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी
बुलडोजर कार्रवाई और कानूनी एकतरफा रुख: विपक्षी दलों और अल्पसंख्यक संगठनों का आरोप है कि सरकार की ‘बुलडोजर नीति’ और कानून-व्यवस्था के नाम पर की जाने वाली कार्रवाइयों में अक्सर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जाता है। धार्मिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: चुनाव और रैलियों के दौरान आने वाले तीखे राजनीतिक और सांप्रदायिक बयान समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। धार्मिक संपत्तियों और ढांचों से जुड़े विवाद: वक्फ बोर्ड से जुड़े मामलों, नामपट्टिका (Nameplate Row) विवाद, मदरसों के सर्वे और कुछ धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों के चलते मुस्लिम समाज में असंतोष बढ़ा है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी: चुनाव में भाजपा की तरफ से मुस्लिम उम्मीदवारों को बहुत कम या न के बराबर टिकट दिया जाता है, जिससे समुदाय को लगता है कि मुख्यधारा की सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सीमित की जा रही है। आर्थिक और रोजगार के मुद्दे: युवाओं में बेरोजगारी, महंगाई, और छोटे व्यवसायों (जैसे कपड़ा, चमड़ा उद्योग आदि) पर आर्थिक नीतियों के असर से भी नाराजगी है।
मुस्लिम मतदाता किस के साथ
समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस गठबंधन (INDIA): वर्तमान में मुस्लिम मतदाताओं का सबसे बड़ा झुकाव अखिलेश यादव की सपा की तरफ है। सपा अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने की ‘साइलेंट’ रणनीति पर काम कर रही है। पिछले चुनावों में भी मुस्लिम समुदाय का करीब 79% एकतरफा वोट सपा को मिला था। AIMIM (असदुद्दीन ओवैसी): ओवैसी की पार्टी मुस्लिम बहुल सीटों (विशेषकर पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल) पर सक्रिय है। वे मुसलमानों को ‘स्वतंत्र नेतृत्व’ देने की बात कह रहे हैं, जिससे सपा के पारंपरिक वोट बैंक में कुछ बिखराव की संभावना बन सकती है। बहुजन समाज पार्टी (BSP): बसपा प्रमुख मायावती भी दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने के लिए मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतार रही हैं, ताकि वे सपा के समीकरण को चुनौती दे सकें।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) की रणनीति
हालांकि भाजपा का मुख्य आधार हिंदुत्व और बहुसंख्यक वोटों पर रहता है, लेकिन पार्टी ने इस बार मुस्लिम समुदाय के ‘पसमंदा मुस्लिम’ (पिछड़े मुसलमान) वर्ग को साधने के लिए एक विशेष रणनीति बनाई है। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी टीम में यूपी से दो प्रमुख मुस्लिम चेहरों—प्रोफेसर तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली—को बड़ी जिम्मेदारियां दी गई हैं ताकि वे मुस्लिम समाज में भाजपा के प्रति भ्रम को दूर कर सकें। भाजपा सरकारी योजनाओं (जैसे मुफ्त राशन, आवास योजना) के लाभार्थियों के माध्यम से भी मुस्लिम मतदाताओं का एक छोटा हिस्सा हासिल करने की कोशिश में है। हालांकि तारिक मंसूर और कुंवर वासित अली भाजपा के लिए कुछ खास कर पाएंगे मुसलमान ऐसा नहीं मानते। मुसलमानों का कहना है कि जिस इलाके में ये रहते हैं उस इलाके से भाजपा का पार्षद तक जितवाने की कूबत इनमें नहीं।
कांग्रेस व सपा के साथ
यूपी के मुस्लिम मतदाताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा को हराने में सक्षम सबसे मजबूत विकल्प (जो इस समय सपा-कांग्रेस का गठबंधन नजर आ रहा है) के साथ जाने का मन बना रहा है, हालांकि विभिन्न सीटों पर स्थानीय उम्मीदवारों की ताकत और अन्य मुस्लिम दलों की सक्रियता के कारण वोट कुछ हिस्सों में बंट भी सकते हैं।
इन सीटों पर हैं प्रभावी भूमिका में
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 143 सीटों पर मुस्लिम मतदाता बेहद प्रभावशाली भूमिका में हैं। इनमें से 73 सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम आबादी 30% से लेकर 65% तक है, जिसका सीधा मतलब है कि यहाँ मुस्लिम समुदाय का वोट ही जीत-हार तय करता है। उत्तर प्रदेश के जिन क्षेत्रों और प्रमुख विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता सबसे ज्यादा निर्णायक हैं, उनमें रूहेल खंड और वेस्ट यूपी की यदि बात करें तो यह क्षेत्र यूपी की मुस्लिम राजनीति का मुख्य केंद्र है, यहाँ कई जिलों में मुस्लिम आबादी 40% से 50% से अधिक है। रामपुर जिला: रामपुर (सदर), चमरौआ, मिलक, बिलासपुर, स्वार। (यहाँ मुस्लिम आबादी सबसे सघन है)। मुरादाबाद जिला: मुरादाबाद नगर, मुरादाबाद देहात, कुंदरकी, बिलारी, ठाकुरद्वारा, कांठ। संभल जिला: संभल, असमोली, गुन्नौर, चन्दौसी। बिजनौर जिला: बिजनौर, नगीना, नजीबाबाद, चांदपुर, धामपुर, नहटौर, बढ़ापुर। सहारनपुर जिला: सहारनपुर नगर, सहारनपुर देहात, देवबंद, बेहट, गंगोह, नकुड़।अमरोहा जिला: अमरोहा, हसनपुर, धनौरा, नौगावां सादात। मुजफ्फरनगर और शामली जिला: कैराना, शामली, थानाभवन, मुजफ्फरनगर सदर, बुढ़ाना, चरथावल, मीरापुर। बरेली जिला: बरेली कैंट, बरेली शहर, बहेड़ी, नवाबगंज, मीरगंज, फरीदपुर, आंवला।मेरठ जिला: मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण, मेरठ कैंट, किथौर, सरधना।
मध्य उत्तर प्रदेश और अवध क्षेत्र
इस क्षेत्र की सीटों पर मुस्लिम आबादी 25% से 35% के बीच है, जो दलित या पिछड़ी जातियों के साथ मिलकर निर्णायक बन जाती है।लखनऊ जिला: लखनऊ पश्चिम, लखनऊ मध्य। कानपुर जिला: कानपुर कैंट, सीसामऊ, आर्यनगर। बाराबंकी जिला: जैदपुर, कुर्सी, बाराबंकी सदर, दरियाबाद। सीतापुर जिला: लहरपुर, सीतापुर सदर, महमूदाबाद, बिसवां।
तराई और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल)
तराई बेल्ट (नेपाल सीमा से सटे जिले) और पूर्वी यूपी की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता बड़ी ताकत हैं। बहराइच जिला: बहराइच सदर, नानपारा, मटेरा, महसी, कैसरगंज। श्रावस्ती और बलरामपुर जिला: श्रावस्ती, भिनगा, बलरामपुर सदर, उतरौला, तुलसीपुर। गोंडा और डुमरियागंज जिला: डुमरियागंज, उतरौला, इटवा, शोहरतगढ़। मऊ और आजमगढ़ जिला: मऊ सदर, घोसी, आजमगढ़ सदर, निजामाबाद, दीदारगंज, मुबारकपुर। प्रयागराज और जौनपुर जिला: जौनपुर सदर, शाहगंज, हंडिया, प्रतापपुर।
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