नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बीजिंग दौरा (19-20 मई) चीन को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला रहा है। इस ‘नो-लिमिट’ गठजोड़ से चीन एक बेहद शक्तिशाली ध्रुव बनकर उभर रहा है, जो अपने रणनीतिक और सैन्य विस्तार के कारण भारत के लिए कुछ चिंताएं जरूर पैदा करता है। चीन और रूस की बढ़ती करीबी भविष्य में भारत के लिए एलएसी (LAC) पर दबाव बढ़ा सकती है, क्योंकि रूस से मिलने वाले सैन्य समर्थन पर चीन की सहमति का असर हो सकता है। चीन-रूस का मजबूत औद्योगिक और रणनीतिक सहयोग भारत की रक्षा तैयारियों को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि भारत अपनी पारंपरिक सैन्य जरूरतों के लिए लंबे समय से रूस पर निर्भर रहा है।
चीन भारत के लिए कितना बड़ा खतरा हो सकता है इसको केवल युद्ध के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। यह खतरा केवल सीमाओं के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और कूटनीतिक आयाम भी हैं। चीन के साथ लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक एक लंबा और अनसुलझा सीमा विवाद है। 2020 की गलवान घाटी की घटना के बाद से दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं।
अमेरिका और रूस के शीर्ष नेताओं की एक ही महीने में बीजिंग यात्रा यह दर्शाती है कि चीन दुनिया के दोनों प्रमुख विरोधी ध्रुवों (अमेरिका और रूस) के बीच संतुलन बनाने की क्षमता रखता है। रूस यूक्रेन युद्ध के बाद से आर्थिक और कूटनीतिक रूप से काफी हद तक चीन पर निर्भर हो गया है, जिससे चीन की यूरेशिया और वैश्विक मंच पर ताकत कई गुना बढ़ गई है। वहीं दूसरी ओर चीन के तेजी से बढ़ते कद के इतर भारत की ओर से कहा जा रहा है कि कुल मिलाकर, बीजिंग में हो रहे ये कूटनीतिक बदलाव चीन को एक बड़ी ताकत बना रहे हैं, लेकिन भारत अपनी बहु-पक्षीय कूटनीति (Multi-alignment) और मजबूत रक्षा तंत्र के जरिए अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में सक्षम है।
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