एम्स ने सुप्रीमकोर्ट में गर्भपात की इज्जात दिए जाने का किया पुरजोर विरोध, अदालत बोली उन्हें नहीं माता पिता को समझाएं
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट में संशोधन करने पर विचार करने को कहा है, ताकि रेप सर्वाइवर्स (दुष्कर्म पीड़िता) के लिए गर्भपात की समय सीमा (जो अभी 24 हफ्ते है) को हटाया या बदला जा सके। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि जब गर्भावस्था दुष्कर्म के कारण हुई हो, तो गर्भपात के लिए कोई कठोर समय सीमा नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने माना कि कानून को समय के साथ बदलना चाहिए (organic) और रेप सर्वाइवर्स को 20-24 हफ्ते के बाद भी गर्भपात की अनुमति मिलनी चाहिए। यह पूरा मामला एक नाबालिग से रेप से जुड़ा हुआ है। जिसमें सुप्रीमकोर्ट ने निर्देश दिए हैं और फैासला 15 वर्षीय नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की 30-31 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देते हुए दिया गया। 24-28 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था के लिए अक्सर कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ती है। फैसला भारत में यौन उत्पीड़न पीड़ितों के प्रजनन अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। दरअसल, एम्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि गर्भपात की इजाजत देने वाले आदेश को वापस लिया जाए एम्स की ओर से कहा गया कि इस स्टेज पर गर्भपात सही नहीं रहेगा. यह भ्रूण और बच्ची दोनों के हित में नहीं होगा. इसके बाद बच्ची कभी मां नहीं बन पाएगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी पुराने आदेश में बदलाव से साफ इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि ये नाबालिग बच्ची से रेप का मामला है. रेप पीड़िता ने जो दर्द और अपमान सहा है, उसे समझना जरूरी है. उस पर अनचाही प्रेग्नेंसी जबरदस्ती नहीं थोपी जा सकती है।
माता पिता राजी तो आपत्ति नहीं
गर्भपात के विरोध में याचिका दायर करने वाले पक्ष से सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि जो बात कोर्ट को समझाना चाहते हैं वह दुष्कर्म का शिकार हुई युवती के माता-पिता को समझाएं। यदि वो राजी होते हैं तो कोर्ट को कोई आपत्ति नहीं।
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