कोर्ट की सख्ती के बादवजूद प्राधिकरण के जोन सी रोहटा रोड कृष्णा विहार में धडल्ले से कांप्लैक्स का अवैध निर्माण
मेरठ। अवैध निर्माणों को लेकर सख्त सुप्रीमकोर्ट के चाबुक का मेरठ विकास प्राधिकरण के अफसरों पर वो असर नजर नहीं आ रहा है जिसकी उम्मीद सुप्रीमकोर्ट ने अपने आदेश में की है। अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के बजाए प्राधिकरण के अफसर उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। महानगर का रोहटा रोड स्थित कृष्णा विहार कालोनी में कांप्लैक्स का अवैध निर्माण इस बात का पुख्ता सबूत है। यह अवैध कांप्लैक्स प्राधिकरण के भ्रष्टाचार की वानगी भर है। इस प्राधिकरण के इस जोन के अफसर ना केवल अवैध निर्माण करा रहे हैं बल्कि अवैध कांप्लैक्स बनाने वाले को कार्रवाई से बचने का रास्ता भी बता रहे हैं। मसलन जितना अवैध निर्माण हो जाता है उसकी तत्काल रंगाई पुताई करा दी जाती है। इसी के चलते पूरे महानगर में और खातसौर से प्राधिकरण के जोन सी में ऐसे अवैध निर्माणों की बाढ़ आयी हुई है। और यह भी सही है कि इलाके के जोनल अधिकारी की मर्जी के बगैर यह संभव नहीं है। सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर बजाए अवैध निर्माण चिन्हित करने के प्राधिकरण के जोन सी के अभियंता इस कांप्लैक्स का अवैध निर्माण कराकर यह यह जताने पर तुले हुए हैं कि पैसा बोलता है आदेश फिर सुप्रीमकोर्ट का हो या फिर शासन का। अवैध कांप्लैक्स का निर्माण रूकने वाला नहीं। रोहटा रोड स्थित कृष्ण विहार कॉलोनी में इन दिनों नियमों को ताक पर रखकर एक अवैध कॉम्प्लेक्स का निर्माण धड़ल्ले से किया जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस अवैध निर्माण को रोकने के बजाय मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) के जिम्मेदार अधिकारी इसे अपना परोक्ष संरक्षण दे रहे हैं। स्थानीय स्तर पर प्राधिकरण की यह कार्यप्रणाली अब गंभीर चर्चा और मिलीभगत के आरोपों के घेरे में है। यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने ने साफ कहा कि आवासीय क्षेत्रों में किए गए इस प्रकार के भारी अवैध व्यावसायिक निर्माणों को किसी भी कीमत पर रेगुलराइज (वैध) नहीं किया जा सकतासुप्रीमकोर्ट बेहद सख्त और जोन अधिकारी मेहनबान
यह लापरवाही और अनदेखी तब सामने आ रही है जब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) अवैध निर्माणों को लेकर बेहद सख्त है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक कड़ा रुख अपनाते हुए पूरे मेरठ क्षेत्र में अवैध निर्माणों को चिह्नित करने और उन पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई करने के स्पष्ट आदेश दिए हैं। अदालत का मकसद शहर को अनियोजित विकास और भूमाफियाओं के चंगुल से मुक्त कराना है। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने और अवैध निर्माणों पर नकेल कसने के बजाय एमडीए के अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। कृष्ण विहार कॉलोनी के निवासियों का आरोप है कि इस अवैध कॉम्प्लेक्स की शिकायत किए जाने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे साफ है कि विभाग के भीतर ही कोई इस अवैध काम को शह दे रहा है।कोर्ट का अपमान सुनियोजित विकास के लिए खतरा भी
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की इस तरह अवहेलना करना और अवैध निर्माणकर्ताओं को संरक्षण देना न सिर्फ न्यायपालिका का अपमान है, बल्कि यह शहर के सुनियोजित विकास के लिए भी एक बड़ा खतरा बन चुका है। अब देखना यह होगा कि शीर्ष अदालत की सख्ती के बाद भी सुस्ती बरतने वाले एमडीए के उच्च अधिकारी इस मामले में कब संज्ञान लेते हैं और दागी अफसरों व अवैध निर्माणकर्ताओं के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।प्राधिकरण अफसरों से नाराज सुप्रीमकोर्ट
सुप्रीमकोर्ट मेरठ विकास प्राधिकरण के अफसरों के अवैध निर्माण पर रवैये से सख्त नाराज है। महानगर में अवैध निर्माण और आवासीय परिसरों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने अब तक का सबसे सख्त रुख अख्तियार किया है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विश्वनाथन की पीठ ने मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) और आवास विकास परिषद की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष जताते हुए शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट समेत पूरे महानगर के चारों जोनों में फैले अवैध निर्माणों पर कड़ा डंडा चलाया है। अदालत ने प्राधिकरण द्वारा सर्वे में चिह्नित की गई जोन-ए की 16,726 अवैध व अनाधिकृत संपत्तियों को तत्काल सील करने और उन्हें खाली कराने की प्रक्रिया शुरू करने के ऐतिहासिक आदेश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट की इस सख्ती के बाद शासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एमडीए सचिव अर्पित गुप्ता को पद से हटाकर लखनऊ संबद्ध कर दिया है।पहले सेंट्रल मार्केट अब पूरा शहर
यह पूरा मामला शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में आवासीय भूखंडों पर बिना स्वीकृत मानचित्र के धड़ल्ले से चल रही व्यावसायिक गतिविधियों (जैसे स्कूल, नर्सिंग होम, बैंक और व्यावसायिक परिसर) से शुरू हुआ था। आवास एवं विकास परिषद ने शुरुआत में सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में 44 अवैध संपत्तियों को चिह्नित कर सील किया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में पुलिस बल की मौजूदगी में 6 बड़े अवैध निर्माणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया, जबकि परिषद की रिपोर्ट के अनुसार अब तक कुल 20 संपत्तियों से अवैध निर्माण हटाया जा चुका है और शेष 24 पर कार्रवाई जारी है। सेंट्रल मार्केट की इस सुनवाई के दौरान जब एमडीए ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट पेश की, तो मामले का दायरा पूरे मेरठ शहर में फैल गया। सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में पिछले 5 सालों में कुकुरमुत्ते की तरह उगीं 600 से अधिक अवैध कॉलोनियों और एमडीए अधिकारियों की मिलीभगत पर बेहद गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब ये अवैध निर्माण हो रहे थे, तब प्राधिकरण के अफसर क्या कर रहे थे?| क्षेत्र/जोन | सुप्रीम कोर्ट का आदेश व वर्तमान स्थिति |
|---|---|
| जोन-ए | इस अकेले जोन में 16,726 संपत्तियां पूरी तरह अवैध और नियमों के विपरीत पाई गईं (जिनमें 12,907 आवासीय, 874 मिश्रित और 2,945 गैर-आवासीय भवन शामिल हैं)। कोर्ट ने इन्हें तत्काल सील करने और खाली कराने का आदेश दिया है। |
| जोन-बी, सी और डी | कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं कि जोन-ए की तर्ज पर बाकी बचे तीनों जोनों में भी तत्काल व्यापक सर्वे कर अवैध निर्माणों को चिह्नित किया जाए। |
| सेटबैक और ईडब्ल्यूएस श्रेणी | सेटबैक एरिया (छोड़ी जाने वाली निर्धारित जगह) में बने 138 अवैध निर्माणों और ईडब्ल्यूएस/एलआईजी श्रेणी के नियमों के उल्लंघन पर भी कार्रवाई जारी रखने को कहा गया है। |
| उल्देपुर (बाहरी इलाका) | गंगानगर के पास स्थित उल्देपुर गांव में बिना अनुमति काटी गईं 100 से अधिक अवैध कॉलोनियों और अवैध निर्माणों को तत्काल बुल्डोजर चलाकर पूरी तरह हटाने और मलबे को साफ करने का आदेश है। |
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