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फैक्ट्री दे रही गेसूपुर बफावत में मौत की सौगात

फैक्ट्री दे रही गेसूपुर बफावत में मौत की सौगात

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फैक्ट्री दे रही गेसूपुर बफावत में मौत की सौगात
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फैक्ट्री के दूषित पानी से गांव वाले कैंसर की चपेट में, मौत के साए में गेसेपुर बफावत को मदद का इंतजार

मेरठ। मेरठ के दौराला थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गेसूपुर बफावत गांव से एक बेहद खौफनाक और प्रशासनिक संवेदनहीनता का मामला सामने आया है। गांव में संचालित एक शहद फैक्ट्री से निकलने वाले खतरनाक केमिकल युक्त दूषित पानी ने स्थानीय पर्यावरण और भूजल को इस कदर तबाह कर दिया है कि पूरा गांव अब ‘कैंसर कैपिटल’ बनने की कगार पर है। फैक्ट्री द्वारा जहरीला पानी सीधे गांव के तालाब में बहाए जाने के कारण भूजल (ग्राउंड वॉटर) पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है, जिसे पीने से गांव में अब तक दो दर्जन (24 से अधिक) लोगों की कैंसर जैसी घातक बीमारी से मौत हो चुकी है। वर्तमान में भी कई ग्रामीण इस जानलेवा बीमारी की चपेट में हैं और तड़प-तड़प कर अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के इस बेल्ट (मेरठ, हापुड़) में चीनी या राइस सिरप मिलाकर नकली शहद बनाने और भारी प्रदूषण फैलाने के कई मामले पकड़े जा चुके हैं। इसके बावजूद स्थानीय प्रदूषण विभाग जमीनी स्तर पर केमिकल डिस्चार्ज को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

उल्लेखनीय है कि विगत 30 मार्च को दौराला थाना क्षेत्र के गांव बफावत स्थित शहद फैक्टरी पर डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई) की टीम ने छापा मारा। टीम ने जांच शुरू करते हुए फैक्टरी को अपने कब्जे में ले लिया और सभी के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। करीब 36 घंटे अफसरों ने इस फैक्ट्री को खंगाला था। उल्लेखनीय हे कि बफावत गांव निवासी दीपक और शैलेंद्र की गांव के बाहरी छोर पर खेत में शहद फैक्टरी संचालित है। इस फैक्टरी में बड़े पैमाने पर शहद का उत्पादन कर देश-विदेश में आपूर्ति की जाती है। डीआरआई ने मिली सूचना के आधार पर सोमवार देर रात यहां छापा मारा। छापे को 24 घंटे से अधिक समय बीत चुका है लेकिन जांच अभी भी जारी है। टीम ने फैक्टरी परिसर को अपने कब्जे में ले रखा है और किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। टीम में शामिल अधिकारियों ने जांच पूरी होने तक किसी भी प्रकार की जानकारी साझा करने से इन्कार किया है।

तालाब बना ‘जहर का स्रोत’, हैंडपंप उगल रहे मौत

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, इस कथित शहद फैक्ट्री में बड़े पैमाने पर केमिकल और सिंथेटिक सिरप का इस्तेमाल किया जाता है। बिना किसी ट्रीटमेंट प्लांट (ETP) के, इस कारखाने का गाढ़ा, बदबूदार और केमिकल युक्त कचरा सीधे गांव के सार्वजनिक तालाब में डाल दिया जाता है। सालों से लगातार रिस रहे इस केमिकल ने जमीन के भीतर के पानी को भी विषैला बना दिया है। गांव के हैंडपंपों और सबमर्सिबल पंपों से अब पीला और बदबूदार पानी निकल रहा है, जिसे मजबूरी में उपभोग करने के कारण ग्रामीण एक-एक कर कैंसर, हेपेटाइटिस, और किडनी की गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।

दो दर्जन मौतें, फिर भी प्रशासन मौन

हैरानी और आक्रोश की बात यह है कि गांव में मौतों का तांडव शुरू होने के बाद ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन के तमाम आला अफसरों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) और जिला स्तर पर कई बार लिखित शिकायतें कीं। लेकिन, ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करने वाला सिस्टम इस मौत बांटने वाली फैक्ट्री के आगे नतमस्तक नजर आ रहा है। अधिकारियों की इस रहस्यमयी खामोशी और लापरवाही के कारण ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। आरोप है कि अफसरों और फैक्ट्री मालिकों के बीच गहरी साठगांठ है, जिसके कारण इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी के बाद भी कारखाने पर कोई ताला नहीं लगाया गया। गांव में करण सिंह, नेपाल मास्टर, रेखा देवी, अतेंद्र चौधरी जैसे लगभग एक साल में 30 मौत हो चुकी है और लगभल 20 लोग कैंसर जैसी बीमारी से पीड़ित हैं। फैक्ट्री में चिमनी होने से गांव के लोगो में दमा खसन की बीमारी फैल रही है और अब तो फैक्टरी के अन्दर बोरिंग चल रहा है जिससे फैक्टरी का पानी जमीन के नीचे पहुंचाया जा सके। फैक्टरी की एनओसी की भी जांच हो, अनुच्छेद 21 के अनुसार प्रदूषण मुक्त हवा और पानी पाने का अधिकार है। ज्ञापन में जिलाधिकारी से मांग की गयी है कि अधिनियम 1974 व अधिनियम 1986 के तहत इस गन्दे केमिकल युक्त पानी व प्रदूषित वायु की रोकथाम कर कार्यवाही करने का कष्ट करें।

पलायन की मजबूरी

गेसूपुर बफावत गांव में आज खौफ का माहौल है। जिन परिवारों ने अपने कमाऊ सदस्यों को कैंसर के कारण खो दिया है, वे आज दाने-दाने को मोहताज हैं। कैंसर के इलाज में लोगों की जमीनें और जीवनभर की पूंजी बिक चुकी है। ग्रामीणों ने उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री से तत्काल मांग की है कि गांव में विशेष मेडिकल कैंप लगाया जाए और बीमार लोगों को मुफ्त कैंसर इलाज की सुविधा दी जाए। गांव के पानी की लैब टेस्टिंग कराकर फैक्ट्री को तुरंत सील किया जाए और दोषियों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज हो। जब तक पानी ठीक नहीं होता, तब तक टैंकरों के माध्यम से गांव को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए। गांव वालों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते इस सुलगती समस्या पर ध्यान नहीं दिया, तो यह गांव पूरी तरह से बीमारियों का कब्रिस्तान बन जाएगा और लोग यहां से सामूहिक पलायन करने को मजबूर होंगे।

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